Wednesday, October 13, 2010
आदि शक्ति मां कालरात्रि की उपासना
नवरात्र के सातवें दिन आदि शक्ति मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना का विधान है। व्यापार संबंधी समस्या, ऋण मुक्ति एवं अचल संपत्ति के लिए मां कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। देखने में मां का स्वरूप विकराल है। परंतु मां सदैव ही शुभ फल प्रदान करती हैं। इस दिन साधकगण अपने मन को सहस्रार चक्र में स्थित करते हैं और मां की अनुकंपा से उन्हें ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं। मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना एवं साधना द्वारा अकाल मृत्यु, भूत-प्रेत बाधा, व्यापार, नौक री, अग्निभय, शत्रुभय आदि से छुटकारा प्राप्त होता है।
नवरात्र का सातवां दिन भगवती कालरात्रि की आराधना का दिन है। श्रद्धालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकंपा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं। कुंडलिनी जागरण के साधक इस दिन सहस्त्रार चक्र को जाग्रत करने की साधना करते हैं। वे गुरु कृपा से प्राप्त ज्ञान विधि का प्रयोग कर कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर शास्त्रोक्त फल प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं। जगदम्बा भगवती के उपासक श्रद्धा भाव से उनके कालरात्रि स्वरूप की पूजा कर उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं।
सहस्त्रार चक्र पर सूर्य का आधिपत्य होता है। लोक - सत्यलोक (अनंत), मातृ देवी - छहों चक्रों की देवियां, देवता - परमशिव, तत्व - तत्वातीत। इसका स्थान तालु के ऊपर मस्तिष्क में ब्रह्म रंध्र से ऊपर सब शक्तियों का केंद्र है और अधिष्ठात्री देवी - शक्ति कात्यायनी हैं।
साधना विधान-
सर्वप्रथम लकडी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाक र मां कालरात्रि की मूर्ति अथवा तस्वीर स्थापित करें तथा चौकी पर कालरात्रि यंत्र को रखें। तदुपरांत हाथ में पुष्प लेकर मां कालरात्रि का ध्यान आह्वान करें। यदि मां की छवि ध्यान अवस्था में विकराल नजर आएं तो घबराएं नहीं बल्कि मां के चरणों में ध्यान एकाग्र करें। मां का स्वरूप देखने में भले ही विकराल है परंतु हर प्रकार से मंगलकारक है।
ध्यान मंत्र -
कराल रूपा कालाब्जा समानाकृति विग्रहा।
कालरात्रि शुभ दधद् देवी चण्डाट्टहासिनी॥
ध्यान के बाद हाथ के पुष्प मां को अर्पण कर दें तथा मां कालरात्रि एवं यंत्र का पंचोपचार से पूजन करें तथा नैवेद्य का भोग लगाएं। इसके बाद मां का मंत्र जाप नौ माला की संख्या में पूर्ण करें - मंत्र - लीं लीं हुं। मनोकामना पूर्ति के लिए मां से प्रार्थना करें। तदुपरांत मां की आरती और कीर्तन करें।
संपूर्ण सौभाग्यवर्घक प्रयोग
यह प्रयोग चैत्र नवरात्र की सप्तमी प्रात: 4 से 6 दोपहर 11:30 से 12:30 के बीच और रात्रि 10:00 बजे से 12:00 के बीच शुरू करना लाभकारी होगा। चौकी पर लाल वस्त्र बिछा कर मां कालरात्रि की तस्वीर और दक्षिणी काली यंत्र व शनि यंत्र स्थापित करें। उसके बाद अलग-अलग आठ मुट्ठी उडद की चार ढेरियां और आठ मुट्ठी गेहूं की चार ढेरियां बना दें। प्रत्येक गेहूं की ढेरी पर मिट्टी का देशी घी से भरा दीपक रख दें और प्रत्येक उडद की ढेरी पर तेल से भरा दीपक रखें। प्रत्येक दीपक में आठ बत्ती रहनी चाहिए। दीपक प्रज्ज्वलित करने के बाद धूप-नैवेद्य, पुष्प-अक्षत अर्पित करें। शुद्ध कंबल का आसन बिछा कर एक पाठ शनि चालीसा, एक पाठ मां दुर्गा चालीसा, एक माला जाप ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ कालरात्रि देव्यै नम: और एक माला ॐ शं शनैश्चराय नम: मंत्र का जाप करें। ऐसा करने से सारे कष्टों का निवारण होगा, पारिवारिक, व्यापारिक और शारीरिक सभी कष्टों से मुक्ति मिलेगी और आपका जीवन सुखी हो जाएगा।
नवरात्र की सप्तमी या किसी भी शुक्ल पक्ष की सप्तमी को रात्रि 8 बजे से लेकर 12 बजे तक यह पूजा करें। चौकी पर लाल कपडा बिछा कर मां कालरात्रि की तस्वीर रखें, साथ में संपूर्ण श्री यंत्र और शनि यंत्र भी स्थापित करें। तत्पश्चात् 108 धान की छोटी-छोटी ढेरी बनाएं और प्रत्येक ढेरी पर 108 कमलगट्टे पर कुमकुम, केसर व हल्दी घोल कर अनार की कलम से श्री लिखें। एक-एक श्री लिखा हुआ कमलगट्टा रख दें। साथ में प्रत्येक ढेरी पर एक पूजा कपूर की डली, एक लौंग, एक इलायची और एक साबुत सुपारी भी रखें। धूप-दीप, नैवेद्य पुष्प अक्षत अर्पित करें और कंबल का शुद्ध आसन बिछा कर ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ कालरात्रि देव्यै नम: मंत्र का जाप पांच माला और पांच माला ॐ शं शनैश्चराय नम: मंत्र का जाप तथा एक माला ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीदं। श्रीं ह्रीं महालक्ष्म्यै नम: मंत्र का जाप करें। तत्पश्चात माँ भगवती से एक श्री लिखा हुआ कमलगट्टा मांग लें उस कमलगट्टे के साथ लौंग, इलायची, साबुत सुपारी, कपूर लाल रेश्मी वस्त्र में बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें और बाकी सारी सामग्री को बहते पानी में बहा दें। ऐसा करने से सारी आर्थिक समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
[श्री सिद्ध शक्तिपीठ शनिधाम के पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती महाराज]
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Monday, October 11, 2010
मां कात्यायनी की उपासना
नवरात्र के पावन समय में छठवें दिन अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष को प्रदान करने वाली भगवती कात्यायनी की पूजा वंदना का विधान है। साधक , आराधक जन इस दिन मां का स्मरण करते हुए अपने मन को आज्ञा चक्र में समाहित करते हैं। योग साधना में आज्ञा चक्र का बडा महत्व होता है। मां की षष्ठम् शक्ति कात्यायनी नाम का रहस्य है। एक कत नाम के ऋषि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए इन्हीं कात्य गोत्र में महर्षि कात्यायन हुए उनके कठोर तपस्या के फलस्वरूप उनकी इच्छानुसार भगवती ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया।
भगवती कात्यायनी ने शुक्लपक्ष की सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक ऋषि कात्यायन की पूजा ग्रहण की और महिषासुर का वध किया था। इसी कारण छठी देवी का नाम कात्यायनी पडा। मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत विशाल एवं दिव्य है। उनकी चार भुजाएं हैं। एक हाथ वर मुद्रा में, दूसरा हाथ अभय मुद्रा में, तीसरे हाथ में सुंदर कमल पुष्प और चौथे हाथ में खड्ग धारण किए हुए हैं। मां सिंह पर सवार हैं। जो मनुष्य मन, कर्म व वचन से मां की उपासना करते हैं उन्हें मां धन-धान्य से परिपूर्ण एवं भयमुक्त करती हैं।
नवरात्र का छठा दिन भगवती कात्यायनी की आराधना का दिन है। श्रद्धालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं। कुंडलिनी जागरण के साधक इस दिन आज्ञा चक्र को जाग्रत करने की साधना करते हैं। वे गुरु कृपा से प्राप्त ज्ञान विधि का प्रयोग कर कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर शास्त्रोक्त फल प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं। जगदम्बा भगवती के उपासक श्रद्धा भाव से उनके कात्यायनी स्वरूप की पूजा कर उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं।
आज्ञा चक्र पर गुरु ग्रह का आधिपत्य होता है। लोक - तप लोक, मातृ देवी - परमेश्वरी, देवता - शम्भू, तन्मात्रा - बुद्धि (संकल्प विकल्प), तत्व - मानस (गुरु)। इसका स्थान दोनों भ्रुवों के मध्य में और अधिष्ठात्री देवी - हाकिनी (विचार शक्ति की देवी)। प्रभाव - सात्विक स्वभाव की वृद्धि, छठी संज्ञा की जाग्रति।
साधना विधान -
सबसे पहले मां कात्यायनी की मूर्ति या तस्वीर को लकडी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें। तदुपरांत चौकी पर मनोकामना गुटिका रखें। दीपक प्रज्जवलित रखें। तदुपरांत हाथ में लाल पुष्प लेकर मां का ध्यान करें।
ध्यान मंत्र -
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवर वाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
इसके बाद मां को हाथ में लिए हुए पुष्प अर्पण करें तथा मां का षोडशोपचार से पूजन करें। नैवेद्य चढाएं तथा 108 की संख्या में मंत्र जाप करें -
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
मंत्र की समाप्ति पर मां की प्रार्थना तथा आरती करें।
सम्पूर्ण रोग विनाशक उपाय
यदि आपके परिवार अथवा आप स्वयं या आपके परिचित में कोई व्यक्ति लंबे समय तक बीमार रहता हो, डाक्टर स्वयं बीमारी को पकड नहीं पा रहे हों। तो आज के दिन यह उपाय शुरू किया जा सकता है। एक चौकी पर लाल कपडा बिछा दें। दुर्गा यंत्र स्थापित करें। सफेद कपडे में सात कौडियां, सात गोमती चक्र, सात नागकेसर के जोडे, सात मुट्ठी चावल बांध कर यंत्र के सामने रख दें। धूप-दीप, नैवेद्य, पुष्प और अक्षत अर्पित करने बाद एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ कात्यायनी देव्यै नम: एक माला शुक्र के बीज मंत्र की और एक माला शनि मंगलकारी गायत्री मंत्र की। ऐसा आज से लेकर 43 दिन तक नियमित करें। कैसी भी बीमारी होगी। उससे छुटकारा मिल जाएगा।
भय से मुक्ति के लिए प्रयोग
यदि हमेशा भय बना रहता है, यदि छोटी सी भी बात पर पैर कांपने लगते हैं, यदि कोई भी निर्णय नहीं ले पाते हैं तो छठे नवरात्र से यह उपाय शुरू करें। घी का दीपक जला कर एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ कात्यायनी देव्यै नम: मंत्र का सुबह और शाम जाप करें। रात्रि सोते समय पीपल के पत्ते पर इस मंत्र को केसर से पीपल की लकडी की कलम से लिख कर अपने सिरहाने रख दें और सुबह मां के मंदिर में रखकर आ जाएं। भय से छुटकारा मिल जाएगा।
ग्रह पीडा निवारण
जिस जातक की जन्म कुंडली में शुक्र प्रतिकूल भाव, प्रतिकूल राशि या प्रतिकूल ग्रहों के साथ स्थित हो उन जातक-जातिकाओं को मां कात्यायनी के मंत्र का जाप करने से ग्रह प्रतिकूलता का निवारण हो जाता है।
राशि उपाय
वृषभ और तुला राशि के लोग मां कात्यायनी की आराधना करें तो संपूर्ण समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
[श्री सिद्ध शक्तिपीठ शनिधाम के पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती महाराज]
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मां स्कंदमाता की उपासना
नवरात्र के पुण्य पर्व पर पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा, अर्चना एवं साधना का विधान वर्णित है। मां के पांचवें स्वरूप को स्कंद माता के नाम से जाना जाता है। पांचवें दिन की पूजा साधना में साधक अपने मन-मस्तिष्क क ो विशुद्ध चक्र में स्थित करते हैं। स्कंद माता स्वरूपिणी भगवती की चार भुजाएं हैं। सिंहारूढा मां पूर्णत: शुभ हैं। साधक मां की आराधना में निरत रहकर निर्मल चैतन्य रूप की ओर अग्रसर होता है। उसका मन भौतिक काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद (अहंकार) से मुक्ति प्राप्त करता है तथा पद्मासना मां के श्री चरण कमलों में समाहित हो जाता है। मां की उपासना से मन की सारी कुण्ठा जीवन-कलह और द्वेष भाव समाप्त हो जाता है। मृत्यु लोक में ही स्वर्ग की भांति परम शांति एवं सुख का अनुभव प्राप्त होता है। साधना के पूर्ण होने पर मोक्ष का मार्ग स्वत: ही खुल जाता है।
मां की उपासना के साथ ही भगवान स्कंद की उपासना स्वयं ही पूर्ण हो जाती है। क्योंकि भगवान बालस्वरूप में सदा ही अपनी मां की गोद में विराजमान रहते हैं। भवसागर के दु:खों से छुटकारा पाने के लिए इससे दूसरा सुलभ साधन कोई नहीं है।
नवरात्र का पांचवां दिन भगवती स्कन्दमाता की आराधना का दिन है। श्रद्धालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकंपा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं। कुंडलिनी जागरण के साधक इस दिन विशुद्ध चक्र को जाग्रत करने की साधना करते हैं। वे गुरु कृपा से प्राप्त ज्ञान विधि का प्रयोग कर कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर शास्त्रोक्त फल प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं। जगदम्बा भगवती के उपासक श्रद्धा भाव से उनके स्कंदमाता स्वरूप की पूजा कर उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं।
विशुद्ध चक्र पर शनि ग्रह का आधिपत्य होता है। इसका लोक - जन लोक, मातृ देवी - कौमारी, देवता - सदाशिव (व्योमनेश्वर और व्योमनेश्वरी), तन्मात्रा - ध्वनि, तत्व - आकाश, इसका स्थान कण्ठ में होता है और अधिष्ठात्री देवी - शाकिनी/गौरी (वाणी) है। प्रभाव - यह वाणी का क्षेत्र है इसलिए यहाँ सबसे ज्यादा ऊर्जा की क्षति होती है।
साधना विधान -
सर्वप्रथम मां स्कंद माता की मूर्ति अथवा तस्वीर को लकडी की चौकी पर पीले वस्त्र को बिछाकर उस पर कुंकुंम से ॐ लिखकर स्थापित करें। मनोकामना की पूर्णता के लिए चौकी पर मनोकामना गुटिका रखें। हाथ में पीले पुष्प लेकर मां स्कंद माता के दिव्य ज्योति स्वरूप का ध्यान करें।
ध्यान मंत्र -
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रित करद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंद माता यशस्विनी॥
ध्यान के बाद हाथ के पुष्प चौकी पर छोड दें। तदुपरांत यंत्र तथा मनोकामना गुटिका सहित मां का पंचोपचार विधि द्वारा पूजन करें। पीले नैवेद्य का भोग लगाएं तथा पीले फल चढाएं। इसके बाद मां के श्री चरणों में प्रार्थना कर आरती पुष्पांजलि समर्पित करें तथा भजन कीर्तन करें।
ग्रह कलह निवारण प्रयोग
यदि आपके परिवार में बिना किसी कारण ही अशांति बनी रहती है। पारिवारिक सदस्य यदि एक साथ बैठ नहीं पाते। किसी न किसी बात को लेकर गृह कलह होता रहता है तो आज के दिन किसी भी समय सुबह, दोपहर शाम यह उपाय शुरू करें। लकडी की चौकी बिछाएं। उसके ऊपर पीला वस्त्र बिछाएं। चौकी पर पांच अलग-अलग दोनों पर अलग-अलग मिठाई रखें। दोनों में पांच लौंग, पांच इलायची और एक नींबू भी रखें। धूप-दीप, पुष्प, अक्षत अर्पित करने के उपरांत एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ स्कंद माता देव्यै नम: मंत्र का जाप करें। साथ ही एक माला जाप शनि पत्नी नाम स्तुति की करें। तत्पश्चात यह समस्त सामग्री किसी पीपल के पेड के नीचे चुपचाप रखकर आना चाहिए। बहुत जरूरी है कि अपने घर में प्रवेश से पहले हाथ-पैर अवश्य धो लें। ऐसा नियमित 43 दिन तक करें। पारिवारिक सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा। वैसे यह उपाय किसी भी महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी से प्रारंभ किया जा सकता है।
पारिवारिक कष्ट निवारण या पति-पत्नी मन-मुटाव निवारण प्रयोग
कई परिवार ऐसे देखे गए हैं कि उनके परिवार में किसी प्रकार की कमी नहीं है। भरा-पूरा परिवार है। धन-दौलत सबकुछ है लेकिन सुख-शांति नहीं है और कोई कारण समझ में नहीं आता। तो पांचवें नवरात्र में इस उपाय को शुरू करना चाहिए। वैसे तो यह उपाय शुक्ल पक्ष की किसी भी पंचमी को शुरू किया जा सकता है और उसे 43 दिन तक नियमित करना चाहिए। अपने पूजा स्थान में ईशान कोण में एक चौकी लगाकर पीला कपडा बिछाएं। उस पर हल्दी और केसर मिला कर स्वास्तिक बनाएं। स्वास्तिक के ऊपर कलश स्थापित करें। कलश में जल भर कर थोडा सा गंगाजल डालें। 7 मुट्ठी धनिया, 7 गांठ हल्दी और 7 बताशे डालें। पांच अशोक पेड के पत्तों को दबाकर कलश पर मिट्ठी की प्लेट रखें। उसमें 7 मुट्ठी गेहूं और 7 मुट्ठी मिट्टी मिला कर प्लेट में रखें। तत्पश्चात एक जटा वाला नारियल रखें उस पर 7 बार कलावा लपेट कर स्थान दें। नारियल पर केसर और हल्दी का तिलक करें। शुद्ध घी का दीपक जला कर गाय का घी, शक्कर, केला, मिश्री, दूध, मक्खन, हलवा भोग के रूप में अर्पित करें। और रुद्राक्ष की माला पर पांच माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ स्कंद माता देव्यै नम: और पांच माला ॐ सर्व मंगलमांगल्यै शिवै सर्वाथ साधिके। शरण्ये ˜यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तु ते। और मां भगवती को प्रणाम करके उठ जाएं। और माँ भगवती को लगाए भोग को निर्जन व गरीब परिवार में बांट दें। मां की आरती करें और कष्ट निवारण के लिए प्रार्थना करें। अगले दिन पुन: भोग व धूप-दीप अर्पित करें और पांच-पांच माला जाप करें। ऐसा नवमी तक करें। अंतिम दिन पांच कुंवारी कन्याओं को बुला कर भोजन कराएं। वस्त्र और दक्षिणा भेंट करें। नारियल फोड कर उस जल को पूरे घर में छिडक दें। गिरी को परिवार के सदस्यों में बांट दें। बाकी समस्त पूजन सामग्री कलश सहित जल में प्रवाह कर दें।
[श्री सिद्ध शक्तिपीठ शनिधाम के पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती महाराज]http://www.shanidham.in/
Sunday, October 10, 2010
भगवती कूष्माण्डा की उपासना
नवरात्र के चौथे दिन आयु, यश, बल व ऐश्वर्य को प्रदान करने वाली भगवती कूष्माण्डा की उपासना-आराधना का विधान है। इस दिन साधक जन अपने मन को अनाहत चक्र में स्थित करके मां कूष्मांडा की कृपा प्राप्त करते हैं। मां सृष्टि की आदि स्वरूपा तथा आदि शक्ति हैं। मां के इसी रूप ने अपने ईषत् हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी कारण मां को कूष्मांडा कहा गया है। मां का निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है। इन्हीं के तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हैं। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब भगवती कूष्मांडा ने ब्रह्मांड की रचना की थी। इनकी आठ भुजाएं हैं। उनके सात भुजाओं में - कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प कलश चक्र एवं गदा शोभायमान हैं। आठवें हाथ में जप की माला है जो अष्ट सिद्धि एवं नौ निधियों को देने वाली है। मां भगवती सिंह पर सवार हैं और इनको कुम्हडों (काशीफल या कद्दू) की बलि अत्यंत प्रिय है। मां पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति भाव से की गई साधना से तुरंत प्रसन्न होकर अपने भक्त ों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं तथा हर प्रकार से मंगल करती हैं।
नवरात्र का चौथा दिन भगवती कूष्माण्डा की आराधना का दिन है। श्रद्धालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकंपा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं। कुंडलिनी जागरण के साधक इस दिन अनाहत चक्र को जाग्रत करने की साधना करते हैं। वे गुरु कृपा से प्राप्त ज्ञान विधि का प्रयोग कर कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर शास्त्रोक्त फल प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं। जगदम्बा भगवती के उपासक श्रद्धा भाव से उनके कूष्माण्डा स्वरूप की पूजा कर उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं।
अनाहत चक्र चंद्र ग्रह का आधिपत्य होता है। इसका लोक - मह लोक, मातृ देवी - वैष्णवी, देवता - ईश्वर (हंसेश्वर और हंसेश्वरी), तन्मात्रा - स्पर्श। तत्व - वायु। इसका स्थान हृदय के पास है और अधिष्ठात्री देवी - काकिनी (श्वसन तंत्र)। इसका प्रभाव - यहां आत्मा परमात्मा के साथ वास करती है जैसे एक गुरु और एक चेला, मौन रहकर सब कुछ का प्रत्यक्ष होना और सीखना। सुख-दु:ख से परे और भक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर होना।
साधना विधान-
सर्वप्रथम मां कूष्मांडा की मूर्ति अथवा तस्वीर को चौकी पर दुर्गा यंत्र के साथ स्थापित करें इस यंत्र के नीचें चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं। अपने मनोरथ के लिए मनोकामना गुटिका यंत्र के साथ रखें। दीप प्रज्ज्वलित करें तथा हाथ में पीलें पुष्प लेक र मां कूष्मांडा का ध्यान करें।
ध्यान मंत्र -
सुरा सम्पूर्ण कलशं रू धिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
ध्यान के बाद हाथ के पुष्प चौकी पर अर्पण करें तथा भगवती कूष्मांडा और यंत्र का पंचोपचार विधि से पूजन करें और पीले फल अथवा पीले मिष्ठान का भोग लगाएं। इसके बाद मां का 108 बार मंत्र जाप करें - ॐ क्रीं कूष्मांडायै क्रीं ॐ। इसके बाद मां की प्रार्थना करें। कुम्हडे (काशीफल या कद्दू) की बलि भी दे सकते हैं तथा मां की आरती, कीर्तन आदि करें।
आयु, यश, बल व ऐश्वर्य प्रदान करने वाला अद्भुत प्रयोग
संपूर्ण परिश्रम, प्रयास और कठिन मेहनत के बावजूद बदनामी का सामना करना पड रहा हो, समाज में जग हंसाई हो रही हो, व्यापार वृद्धि के लिए किए गए सम्पूर्ण प्रयास विफल हो रहे हो, तो आज का दिन उन लोगों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। चार कुम्हडे (काशीफल या कद्दू), चौकी पर लाल कपडा बिछा कर इन सबको उस पर रख दें। धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प अर्पित करने के बाद पांच माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ कूष्माण्डा देव्यै नम:, एक माला ॐ शं शनैश्चराय नम: का जाप करें। तत्पश्चात इनको अपने ऊपर से 11 बार उसार लें, उसारने के बाद छोटे-छोटे टुकडे करके किसी तालाब में डाल दें। सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी।
चर्म रोगों से छुटकारा के लिए अद्भुत प्रयोग
जिन्हें बार-बार, शरीर में फोडे-फुंसी होती हो या कोई न कोई चर्म रोग हमेशा रहता हो उन्हें आज के दिन यह उपाय प्रारंभ करना लाभदाय रहेगा। एक चांदी की कटोरी ले लें उसमें स्वच्छ जल भर कर 18 पत्ते तुलसी के, 9 पत्ते नीम के और 3 पत्ते बेलपत्र के डाल लें। अपने सामने स्वच्छ आसन पर रख दें। तत्पश्चात घी का दीपक और चंदन का धूप जला कर एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामूण्डाय विच्चे ॐ कूष्माण्डा देव्यै नम: और शनि पत्नी नाम स्तुति की एक माला करने से लाभ होगा।
डूबा हुआ पैसा प्राप्ति का सरल उपाय
यदि आपका पैसा कहीं फंस गया हो, या जिसको भी आप पैसा देते हैं वह पैसा वापस नहीं देता हो, तो 11 गोमती चक्र को हरे कपडे में बांध कर पवित्र थाली में अपने सामने रख दें, घी का दीपक जलाएं, एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामूण्डाय विच्चे ॐ कूष्माण्डा देव्यै नम: और एक माला ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम: का जाप करें। तत्पश्चात इस सामग्री को किसी सुनसान जगह में उस व्यक्ति का ध्यान करते हुए गढ्डा खोद कर दबा दें। इस उपाय से आपका धन आपको वापस अवश्य मिलेगा। उपाय आज के दिन दोपहर 12 बजे से शुरू करें और लगातार 43 दिन तक नियमित करें।
ग्रह पीडा निवारण
जिस जातक की जन्म कुंडली में बुध कमजोर हो या बुध की वजह से आपके जीवन में कोई परेशानी आ रही हो तो मां भगवती कूष्माण्डा का मंत्र का जाप करना बहुत ही शुभ रहेगा।
[श्री सिद्ध शक्तिपीठ शनिधाम के पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती महाराज]
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Saturday, October 9, 2010
मां चंद्रघण्टा की उपासना
नवरात्र के तीसरे दिन भगवती मां दुर्गा की तीसरी शक्ति भगवती चंद्रघण्टा की उपासना की जाती है। मां का यह रूप पाप-ताप एवं समस्त विघ्न बाधाओं से मुक्ति प्रदान करता है और परम शांति दायक एवं कल्याणकारी है। मां के मस्तक में घंटे की भांति अर्घचंद्र सुशोभित है। इसीलिए मां को चंद्रघण्टा कहते हैं। कंचन की तरह कांति वाली भगवती की दश विशाल भुजाएं है। दशों भुजाओं में खड्ग, वाण, तलवार, चक्र, गदा, त्रिशूल आदि अस्त्र-शस्त्र शोभायमान हैं। मां सिंह पर सवार होकर मानो युद्ध के लिए उद्यत दिखती हैं। मां की घंटे की तरह प्रचण्ड ध्वनि से असुर सदैव भयभीत रहते हैं। तीसरे दिन की पूजा अर्चना में मां चंद्रघंटा का स्मरण करते हुए साधकजन अपना मन मणिपुर चक्र में स्थित करते हैं। उस समय मां की कृपा से साधक को आलौकिक दिव्य दर्शन एवं दृष्टि प्राप्त होती है। साधक के समस्त पाप-बंधन छूट जाते हैं। प्रेत बाधा आदि समस्याओं से भी मां साधक की रक्षा करती हैं।
नवरात्र का तीसरा दिन भगवती चंद्रघण्टा की आराधना का दिन है। श्रद्धालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकंपा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं। कुंडलिनी जागरण के साधक इस दिन मणिपुर चक्र को जाग्रत करने की साधना करते हैं। वे गुरु कृपा से प्राप्त ज्ञान विधि का प्रयोग कर कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर शास्त्रोक्त फल प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं। जगदम्बा भगवती के उपासक श्रद्धा भाव से उनके चंद्रघण्टा स्वरूप की पूजा कर उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं।
साधना विधान -
सबसे पहले मां चंद्रघण्टा की मूर्ति अथवा तस्वीर का लकडी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर श्री दुर्गा यंत्र के साथ स्थापित करें तथा हाथ में लाल पुष्प लेकर मां चंद्रघण्टा का ध्यान करें।
ध्यान के बाद हाथ में लिए हुए पुष्प मां की तस्वीर पर अर्पण करें तथा अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए मां के 108 बार मंत्र जाप करें। मंत्र इस प्रकार है- ओम् चं चंद्रघण्टाय हुं॥ ध्यान रहे, मंत्र जाप से पहिले मां का तथा दुर्गा यंत्र सहित अखण्ड ज्योति क ा पंचोपचार विधि से पूजन करें। लाल पुष्प चढाएं तथा लाल नैवेद्य का भोग लगाएं। मंत्र पूर्ण होने पर मां की प्रार्थना करें तथा भजन कीर्तन के बाद आरती करें।
भगवती की पूजा में दूध की प्रधानता होनी चाहिए एवं पूजन के उपरान्त वह दूध किसी ब्राह्मण को दे देना उचित है। यह संपूर्ण दु:खों से मुक्त होने का एक परम साधन है।
[श्री सिद्ध शक्तिपीठ शनिधाम के पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती महाराज]
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Friday, October 8, 2010
मनोरथ सिद्धि करती है मां ब्रह्मचारिणी
नवरात्र के दूसरे दिन भगवती मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, अर्चना का विधान है। साधक एवं योगी इस दिन अपने मन को भगवती मां के श्री चरणों मे एकाग्रचित करके स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित करते हैं और मां की कृपा प्राप्त करते हैं। ब्रह्म शब्द का तात्पर्य (तपस्या)। ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तप का आचरण करने वाली ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप ज्योतिर्मय एवं महान है। मां के दाहिने हाथ में जपमाला एवं बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित रहता है। अपने पूर्व जन्म में वे हिमालय (पर्वतराज) के घर कन्या रूप में प्रकट हुई थीं। तब इन्होंने देवर्षि नारद जी के उपदेशानुसार कठिन तपस्या करके भगवान शंकर को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। मां ब्रह्मचारिणी की उपासना से मनोरथ सिद्धि, विजय एवं नीरोगता की प्राप्ति होती है तथा मां के निर्मल स्वरूप के दर्शन प्राप्त होते हैं। प्रेम युक्त की गई भक्ति से साधक का सर्व प्रकार से दु:ख-दारिद्र का विनाश एवं सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
नवरात्र का दूसरा दिन भगवती ब्रह्मचारिणी की आराधना का दिन है। श्रद्धालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं। कुंडलिनी जागरण के साधक इस दिन स्वाधिष्ठान चक्र को जाग्रत करने की साधना करते हैं। वे गुरु कृपा से प्राप्त ज्ञान विधि का प्रयोग कर कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करते हुए इसे जाग्रत कर शास्त्रोक्त फल प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं। जगदम्बा भगवती के उपासक श्रद्धा भाव से उनके ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा कर उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं।
साधना विधान-
मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा या तस्वीर को लकडी के पट्टे पर लाल कपडा बिछाकर स्थापित करें और उस पर हल्दी से रंगे हुए पीले चावल की ढेरी लगाकर उसके ऊपर हकीक पत्थर की 108 मनकों की माला रखें। परिवार या व्यक्ति विशेष के आरोग्य के लिए एवं अन्य मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु मनोकामना गुटिका रखकर हाथ में लाल पुष्प लेकर मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें।
मनोकामना गुटिका पर पुष्पांजलि अर्पित कर उसका पंचोपचार विधि से पूजन करें। तदुपरांत दूध से निर्मित नैवेद्य मां ब्रह्मचारिणी को अर्पित करें। देशी घी से दीप प्रज्जवलित रहे। हकीक की माला से 108 बार मंत्र का जाप करें -
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् ब्रह्मचारिण्यै नम:
मंत्र पूर्ण होने पर मां से अपने अभीष्ट के लिए पूर्ण भक्ति भाव से प्रार्थना करें। तदुपरांत मां की आरती करें तथा कीर्तन करें।
इस दिन पूजन करके भगवती जगदम्बा को चीनी का भोग लगावे और ब्राह्मण को दे दें। यों करने से मनुष्य दीर्घायु होता है।
[श्री सिद्ध शक्तिपीठ शनिधाम के पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती महाराज]
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Thursday, October 7, 2010
माँ शैलपुत्री की उपासना
सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए नवरात्र के पावन पर्व में पूजी जाने वाली नौ दुर्गाओं में सर्व प्रथम भगवती शैलपुत्री का नाम आता है। पर्व के पहले दिन बैल पर सवार भगवती मां के पूजन-अर्चना का विधान है। मां के दाहिने हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। अपने पूर्वजन्म में ये दक्ष प्रजापति की कन्या के रूप में पैदा हुई थीं। उस समय इनका नाम सती रखा गया। इनका विवाह शंकर जी से हुआ था। शैलपुत्री देवी समस्त शक्तियों की स्वामिनी हैं। योगी और साधकजन नवरात्र के पहले दिन अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं और योग साधना का यहीं से प्रारंभ होना कहा गया है।
साधारण गृहस्थ लोगों के लिए पूजा विधान
साधना विधि -
सबसे पहले मां शैलपुत्री की मूर्ति अथवा तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचें लकडी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। इसके ऊपर केशर से शं लिखें और उसके ऊ पर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें। तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें। मंत्र इस प्रकार है-
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:।
मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड दें। तत्पश्चात् मनोकामना गुटिका का पंचोपचार द्वारा पूजन करें। दीप प्रज्जवलित करके ही पूजन करें। यदि संभव हो तो नौ दिनों तक अखण्ड ज्योति जलाने का विशेष महत्व होता है। इसके बाद भोग प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। संख्या 108 होनी चाहिए। मंत्र - ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:। मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां के चरणों में अपनी मनोकामना को व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा श्रद्धा से आरती कीर्तन करें।
कानूनी मसलों से छुटकारा हेतु प्रयोग:-
अनावश्यक टांग खिचाई, बेवजह लोग आपको कानूनी मसलों में फंसा रहे हों या ना चाहते हुए भी लोग आपको परेशान कर रहे हों तो यह प्रयोग आपको बहुत ही काम आएगा। रात्रि में 8 बजे के बाद चौकी पर लाल कपडा बिछा कर उस पर दुर्गा जी का यंत्र स्थापित करें। लाल कपडे में 8 मुट्ठी अखंडित गेंहू अपने ऊपर से 7 बार उसार कर के रख दें। तत्पश्चात 7 लौंग, 7 गोमती चक्र, 7 साबुत सुपारी, 7 लाल चंदन के टुकडे रखकर इन समस्त सामग्री की एक पोटली बना दें। पोटली को मां भगवती के यंत्र के सामने अपनी मनोकामना का ध्यान करते हुए रख दें। तत्पश्चात श्रद्धापूर्वक पंचोपचार पूजन करें। चौमुखा घी का दीपक जलाएं और साथ में एक सरसों के तेल का दीपक जलाएं। सात माला ओम् जयंति मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते॥ का जाप करें और एक माला ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम: का जाप करें। तत्पश्चात समस्त सामग्री को अपने ऊपर से उसार कर के मां भगवती के मंदिर में चुपचाप रख कर आ जाएं।
अनावश्यक कोर्ट-कचहरी के मामलों से छुटकारा मिल जाएगा।
कारोबारी, पारिवारिक, कानूनी परेशानियों से छुटकारा दिलाने वाला अमोध प्रयोग
आप अपना काम कर रहे हो कठिन परिश्रम के बावजूद भी लोग आपका हक मार देते हैं। अनावश्यक कार्य अवरोध उत्पन्न करते हों। आपकी गलती न होने के बावजूद भी आपको हानि पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा हो तो यह प्रयोग आपके लिए बहुत ही लाभदायक सिद्ध होगा। रात्रि में 10 बजे से 12 बजे के बीच में यह उपाय करना बहुत ही शुभ रहेगा। एक चौकी के ऊपर लाल कपडा बिछा कर उसके ऊपर 11 चौमुखा घी का दीपक जलाएं दीपक प्रज्वलित करने के बाद प्रत्येक दीपक में 1-1 लौंग डाल दें। तत्पश्चात श्रद्धापूर्वक पंचोपचार पूजन करें। और वहीं बैठकर 7 माला ओम् सर्व मंगलमांगल्यै शिवै सर्वाथ साधिके। शरण्ये र्त्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते। का जाप करें। उसके बाद एक माला ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम: । का जाप माला करें, पूजा के उपरांत सुबह प्रत्येक दीपक को अपने ऊपर से 1 बार उसार कर के ब्रह्म मुहूर्त में बिना किसी से बात किए यह समस्त दीपक पीपल के पेड के नीचे या तालाब या किसी बहते हुए पानी में प्रवाह कर दें। कानूनी कैसी भी समस्या होगी उससे छुटकारा मिल जाएगा।
सूर्य ग्रह दशा निवारण उपाय
आपकी सिंह राशि है आपको सूर्य की महादशा है। और निजकृत कर्मो के अनुसार सूर्य आपकी जन्मकुंडली में प्रतिकूल फल प्रदान कर रहे हैं उसके निवारण के लिए नौ दिन हर रोज सुबह-शाम मां शैलपुत्री के मंत्र का ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम: जाप करना कल्याणकारी रहेगा।
अति विशेष भोग मां को लगाया गया भोग बदलेगा आपके भाग्य को नवरात्र का पहला दिन माँ शैलपुत्री का- इस दिन भगवती जगदम्बा की गोघृत से पूजा होनी चाहिए अर्थात् षोडशोपचार से पूजन करके नैवेद्य के रूप में उन्हें गाय का घृत अर्पण करना चाहिए एवं फिर वह घृत ब्राह्मण को दे देना चाहिए। इसके फलस्वरूप मनुष्य कभी रोगी नहीं हो सकता।
[श्री सिद्ध शक्तिपीठ शनिधाम के पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती महाराज]
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